यादें

आज़ फ़ुर्सत से 

दिल की संदूक़ों को जब खोलकर देखा 

यादों से लिपटी कई तस्वीरों को देखा  

कुछ किस्से पड़े थे कोने में 

कुछ रिश्ते झाँक रहे थे छुप छुप के 

पापा की फ़िक्र 

माँ का दुलार 

भाई बहन का प्यार 

रिश्ते नातों का भंडार 

कुछ खट्टी कुछ मीठी बातें आयी उमड़ के सामने 

जो सदियों से दबी थी मुलाक़ातों की पुस्तक तले 

हैरान नज़रों से ताक रहे थे कुछ अधूरे वादे 

पूछ रहे थे सौ सवाल वो नेक इरादे 

चहक उठा वो सोता हुआ बचपन भी 

मुस्कुरा उठे गुड्डे गुड़िया 

हँस दिए सारे खिलोने 

धूल में लिपटी हुई वो साइकिल भी बोली 

चल चलेगा क्या दोस्तों की गली 

इतनी हलचल सुन 

जाग उठे मन के सारे अरमान 

जैसे खुल गया हो यादों का पिटारा सा 

लग गया हो जज़्बातों का मेला सा 

मानो लौट आया बचपन वो प्यारा सा 

खिलखिलाया आज़ फिर आँगन मेरा 

लेकर यादों की बारात 

आज़ भी 

जब जी चाहे चल पड़ता हूँ उन गलियों में 

जहाँ शाम बड़ी सुहानी लगती है 

मौजों की रवानी सी लगती है  

कितना भी दूर जायें हम 

कितना भी भूल जायें हम  

यादें आज भी दस्तक देती हैं 

तन्हाई में साथ ना छोड़ती 

गम में भी मुँह ना मोड़ती 

क्योंकि 

यादें मरा नहीं करतीं 

ये हमेशा दिलों में ज़िंदा रहती हैं 

ये हमेशा दिलों में ज़िंदा रहती हैं 

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14 Comments

  1. It was an awesome experience to stumble upon your blog through the challenge. I have literally loved your poetry. Will definitely miss it from tomorrow. All the best for future.
    #ContemplationOfaJoker #Jokerophilia

    Liked by 1 person

    1. Thank you so much Manas! It was great connecting with you. Wish you lot of success ahead. And you say something at the end of your posts..it’s not a goodbye..it’s a GOOD BYE! Right! Chalo then, catch you at the other end 🙂

      Liked by 1 person

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