ज़िंदगी

ज़िंदगी के पन्नों को जब पलटकर देखा
चंद लम्हों में खुद को सिमटे हुए देखा
ये दास्तान भी कितनी अजीब है
कभी फूलों का गुलशन
तो कभी पतझड़ का मौसम
सौ दर्द है सौ ख्वाहिशें
सौ अरमान हैं सौ हैं बंदिशें
दिल कहता है तोड़ दे इन बंदिशों को
कब तक जकड़ा रहेगा इन जंजीरों में खुद को
कर ले इस दिल की सारी चाहतें पूरी
चल निकालें मिलकर आशाओं की अपनी ये टोली

इतनी रफ्तार हो तूझ में
बिजली सी तेजी हो तूझ में
कर दे अपनी तेज से इस दुनिया को चकाचौंध
दिखला दे तुझमें भी है तलवार की धार
तुझमें भी है सूरज का ताप
माना कि अंगारों से गुजरा है तू
पर तभी तो सोने सा निखरा है तू
डरना ना मुश्किलों से
हारना ना किस्मत की लकीरों से
बस रूकना नहीं थकना नहीं
गिर भी जाए तो थमना नहीं
खुद पर एतबार रख यारा
मंजिल भी मिलेगी एक दिन
चट्टानों से टकराने से

ये ज़िंदगी की पुकार है यारा
दौड़ के लगा ले गले से
चल आज़माने दे इसे आज फिर एक बहाने से
चल आज़माने दे इसे आज फिर एक बहाने से

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60 Comments

  1. Wow, what a beautiful poem! Though my mother tongue is Hindi, I am not comfortable writing poetry. It requires a lot of depth. Kudos Rashmi for having the depth and dexterity of words! What a wonderful job you have done! I know AtoZ is over, but let’s stay in touch on the blog! I am so glad to have met you here!

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  2. क्या ख़ूब लिखा है रश्मि आपने। आज की ज़िंदगी पर बिलकुल सही बैठता है।

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  3. Awesome poem. Your command over Hindi is awesome. My favourite line was ‘mana ki angaaro se guzra hai tu, par tabhi toh sone sa nikhra hai tu.’ I am ending the day on high. Keep writing such poems.

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  4. Wow! That was mind blowing! Words have the power to motivate someone to such an extent, they can urge someone to turn over a new leaf in life! Those are the kind of words you have penned, Rashmi! Thank you so much!

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